United Nations में भारत ने दुनिया के सामने अपनी ऐतिहासिक भूमिका और वैश्विक शांति के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को मजबूती से रखा। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में आयोजित एक अहम ओपन डिबेट के दौरान भारत ने साफ शब्दों में कहा कि आज की दुनिया 1940 के दशक जैसी नहीं रही, इसलिए संयुक्त राष्ट्र की कार्यप्रणाली और संरचना में भी बड़े बदलाव जरूरी हैं।
भारत के स्थायी प्रतिनिधि Harish Parvathaneni ने अपने संबोधन में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारत के योगदान को याद करते हुए कहा कि लाखों भारतीय सैनिकों ने दुनिया में शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी। उन्होंने कहा कि लगभग 25 लाख भारतीय सैनिक मित्र देशों के साथ युद्ध में शामिल हुए थे और 87 हजार से ज्यादा जवानों ने सर्वोच्च बलिदान दिया।
भारतीय प्रतिनिधि ने कहा कि वह लड़ाई भारत की नहीं थी, लेकिन इसके बावजूद देश ने मानवता और वैश्विक शांति के लिए अपनी जिम्मेदारी निभाई। यही वजह थी कि आजादी से पहले भी भारत संयुक्त राष्ट्र के गठन से जुड़ा और बाद में उसकी मूल भावना — शांति, सहयोग और बहुपक्षीय व्यवस्था — का मजबूत समर्थक बना रहा।
भारत ने अपने बयान में कहा कि दुनिया ने पिछले कई दशकों में उपनिवेशवाद, शीत युद्ध, क्षेत्रीय संघर्षों और राजनीतिक अस्थिरता जैसे कई बड़े बदलाव देखे हैं। इसके बावजूद भारत ने हमेशा संयुक्त राष्ट्र और उसके सिद्धांतों में भरोसा बनाए रखा।
भारत ने शीत युद्ध के दौर में संयुक्त राष्ट्र शांति मिशनों में निभाई गई अपनी भूमिका का भी जिक्र किया। भारत ने कोरिया, कांगो, इंडोचाइना और गाजा जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में शांति स्थापित करने के प्रयासों में सक्रिय भागीदारी निभाई थी। भारत ने कहा कि आज भी उसकी विदेश नीति वैश्विक शांति और स्थिरता को मजबूत करने पर केंद्रित है।
अपने संबोधन में भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग को फिर दोहराया। भारत का कहना था कि वर्तमान वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए पुरानी व्यवस्था अब पर्याप्त नहीं है। सुरक्षा परिषद में पारदर्शिता बढ़ाने, विकासशील देशों को उचित प्रतिनिधित्व देने और निर्णय प्रक्रिया को अधिक लोकतांत्रिक बनाने की जरूरत है।
भारत ने यह भी कहा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को “जीवंत और आधुनिक संस्था” बनना होगा, क्योंकि दुनिया तेजी से बदल रही है। अगर संयुक्त राष्ट्र समय के अनुसार खुद को नहीं बदलेगा, तो उसकी प्रभावशीलता और विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होते रहेंगे।
भारत ने महासभा को अधिक शक्तिशाली बनाने और सभी सदस्य देशों की भागीदारी बढ़ाने की भी वकालत की। भारत का मानना है कि वैश्विक संस्थाओं को केवल कुछ शक्तिशाली देशों तक सीमित नहीं रखा जा सकता, बल्कि उन्हें पूरी दुनिया की आकांक्षाओं और वास्तविकताओं का प्रतिनिधित्व करना चाहिए।
